जिसे कहने के लिए,
तुम्हारा इंतज़ार था,
वो बात कहीं छूट गई है।
जिसके सिरहाने सर रखकर
सोने को मैं,
बेकरारा थी,
वो रात कहीं टूट गई है।
अतृप्त से होठों पर
अक्सर जिह्वा फेर देती हूँ
फ़िर सहसा तुम्हें याद करने पर
जब कभी तुम हावी होते हो,
मेरी कल्पना पर,
सच, वो कुछ ज्यादा ही
उतावली हो उठती है,
तुम्हें जान पाने को,
तुम्हें छू पाने को
और करीब बुलाकर हैरान हो,
पूछने को कि 'अरे तुम यहां कैसे'?
रास्ते कहीं खत्म नहीं होते, हम एक बार अपनी मंजिल को छू लें,लेकिन ये भी सच है कि एक रास्ता पार होते ही दूसरी राह बाहें फैलाए हमारा स्वागत करने को तैयार होती है। बस देर इस बात की है कि हम जो मंजिल पा चुके है उसका मोह त्याग कर नए रास्ते को अपना लें...
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गुरुवार, 16 अक्टूबर 2008
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