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शुक्रवार, 30 मार्च 2012

मां, तू बहुत याद आती है...




मां, तू बहुत याद आती है...
ठीक सुबह की नींद सी मीठी तेरी याद,
अक्‍सर रात को नींद न आने वाला दर्द बन जाती है...
मां, तू बहुत याद आती है,
पलकों के झपकने के नित्‍यकर्म में,
जैसे कभी आंखों में कुछ गिरने पर,
वो फड़फड़ा जाती हैं,
मां, तू बहुत याद आती है...
खाली प्रेम पत्र सा है तेरा नेही हृदय,
न जताने पर अपार संभावनाओं से भरा,
लेकिन जब जताती है,
तो पन्‍नों की कमी पड़ जाती है...
मां, तू बहुत याद आती है...

अनिता शर्मा

शुक्रवार, 28 अगस्त 2009

नियती

मेरी कलम,
आज अजीब जीद कर रही है,
लंबी सी है,
फन उठाए बार बार मुझे डस रही है,
कहती है,
तुम्हारे बारे में नहीं लिखेगी,
अवहेलना के तीखें दंश,
और नहीं सहेगी...
नासमझ है
मुंह पर पुते,
कीचड़ को,
कागज पर रगड़ उतारने से,
मना जो कर रही है...

अब तुम ही समझाओ इसे
कि अवहेलना ही सही,
पर तुम्हारा दिया कुछ तो है,
इसके बेचारगी भरे जीवन में,
जो इस के नग्न शरीर पर,
वस्त्र सा पड़ा रहता है,
दुखता हो तो भी क्या,
अवहेलना सहसह कर
मुंह उठाए फिरफ़िर
तुम्हारी ओर दौड़ना,
यही तो इस की नियती है।

(अनीता शर्मा)

जब कभी तुम जिंदगी से थक जाओ...

जब कभी तुम जिंदगी से थक जाओ, तो मेरे पास आना... बैठना घड़ी भर को संग, वो तमाम कि‍स्से मुझे फि‍र से सुनाना. और पूछना मुझसे क‍ि हुआ कुछ ऐस...