रास्ते कहीं खत्म नहीं होते, हम एक बार अपनी मंजिल को छू लें,लेकिन ये भी सच है कि एक रास्ता पार होते ही दूसरी राह बाहें फैलाए हमारा स्वागत करने को तैयार होती है। बस देर इस बात की है कि हम जो मंजिल पा चुके है उसका मोह त्याग कर नए रास्ते को अपना लें...
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शुक्रवार, 30 मार्च 2012
मां, तू बहुत याद आती है...
मां, तू बहुत याद आती है...
ठीक सुबह की नींद सी मीठी तेरी याद,
अक्सर रात को नींद न आने वाला दर्द बन जाती है...
मां, तू बहुत याद आती है,
पलकों के झपकने के नित्यकर्म में,
जैसे कभी आंखों में कुछ गिरने पर,
वो फड़फड़ा जाती हैं,
मां, तू बहुत याद आती है...
खाली प्रेम पत्र सा है तेरा नेही हृदय,
न जताने पर अपार संभावनाओं से भरा,
लेकिन जब जताती है,
तो पन्नों की कमी पड़ जाती है...
मां, तू बहुत याद आती है...
अनिता शर्मा
रविवार, 4 अप्रैल 2010
मेरा अस्तित्व: वीर्य सा
बुधवार, 30 दिसंबर 2009
स्मृति विहंग
जब कभी
इस विहड़ नीड़ पर
फडफड़ा उठता है
तुम्हारी स्मृति का
चिर-आयु विहंग
उठती है
जाने कैसी विस्मृत सी
दुर्लभ सुगंध...
अकसर जब सांसे
मांगा करती हैं
तुम्हारी सांसों का वही अवैध स्पर्श...
जाने क्यूं हृदय हो उठता है
उन पर
यकायक ही बेहद कर्कष
चुपके से नयनों में
नींद लिए बैठी आंखें
अकसर भूले से
सो भी जाया करती हैं
पर अभागिन
नींद कहां कभी पाया करती हैं
विपुल राग ही बजा करते हैं
होठों की विणा पर
तुम ही कहो मिलन के गीत
गाऊं तो क्योंकर ?
भोगा मेरे हर रस को तुमने
रोद्र रस ही न किया तनिक भी स्पर्श
बतलाओं तो देकर जरा जिव्हा को कष्ट
इस निरस टूटे तारे को अब
भला कौन अपनाएगा सहर्ष...
अनिता शर्मा
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