रास्ते कहीं खत्म नहीं होते, हम एक बार अपनी मंजिल को छू लें,लेकिन ये भी सच है कि एक रास्ता पार होते ही दूसरी राह बाहें फैलाए हमारा स्वागत करने को तैयार होती है। बस देर इस बात की है कि हम जो मंजिल पा चुके है उसका मोह त्याग कर नए रास्ते को अपना लें...
शनिवार, 12 सितंबर 2015
शनिवार, 26 जनवरी 2013
ईश्वर का ईश्वर
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ईश्वर का ईश्वर...
कल यकायक जब मन घबरा उठा,तो मैं सीधें पहुंची मंदिर की दहलीज पर,
नमन कर कहा ईश्वर से...
--
मेरे सृजनकर्ता,
परमपिता, पालनहार,
सुन लो मेरी गुहार,
संकट काटो मेरा,
मुझे जन्म दिया है तो,
हर दुख हर लो मेरा...
मैं तुम्हारी कृति हूं,
खो चुकी अपनी धृति हूं...
यह कह, श्रृद्धा से जब
नम आंखों को जब किया बंद,
यकायक कहीं से सुना एक स्वर मंद...
दबा-दबा सा स्वर कह रहा था,
तुम... तुम, तुम ही तो हो मेरी सृजनकर्ता,
भला मैं कैसे हुआ तुम्हारा दुखहर्ता,
मैंने तुम्हारा नहीं,
तुमने मेरा सृजन किया है,
तुम... हां मानव, तुम ही तो हो,
मुझे उत्पन्न करने वाले,
गढ़ कर पूजने वाले...
और मेरे अस्तीत्व को बेवजह परमपिता,
मां कह खुद पर मंढने वाले,
सुनो, मुझ पर यूं ही अपनी कृपा बनाए रखना,
मेरा अस्तित्व तुमसे है,
यह बात कभी न विसरना,
मेरी कृपा पर तुम नहीं,
तुम्हारी कृपा पर मैं जीवित हूं...
देते रहना मुझे यूं ही नियमित,
तुम्हारे डर और भावनाओं का आहार,
ताकि मैं कर सकूं जीवित विहार,
...
अंत में,
हे मानव,
मेरा नमन करो स्वीकार,
क्योंकि तुम ही तो हो,
हां, तुम ही तो हो मेरे पालन हार...
अनिता शर्मा
सोमवार, 2 अप्रैल 2012
हत्या...
मुझे सजा होनी चाहिए,
वह भी फांसी की,
क्यों,
क्योंकि मैं हत्या की दोषी हूं...
वह भी एक या दो नहीं...
मैं रोज एक हत्या करती हूं...
कभी अपने आत्मसम्मान को,
तो कभी अपने अस्तित्व को,
मैं नित नए तरीको से कत्ल करती हूं...
--
ओह, मैं भी कितनी मुर्ख हूं...
भला मुझे सजा क्यों मिले,
सजा तो जीवित को निर्जीव करने पर मिलती है...
पर मैं,
मुर्दा लाशों में महज खंजर घोपा करती हूं...
रोंदती हूं,
मर चुके अस्तित्व को,
और बस यूं ही कभी-कभी खुद को...
वह भी फांसी की,
क्यों,
क्योंकि मैं हत्या की दोषी हूं...
वह भी एक या दो नहीं...
मैं रोज एक हत्या करती हूं...
कभी अपने आत्मसम्मान को,
तो कभी अपने अस्तित्व को,
मैं नित नए तरीको से कत्ल करती हूं...
--
ओह, मैं भी कितनी मुर्ख हूं...
भला मुझे सजा क्यों मिले,
सजा तो जीवित को निर्जीव करने पर मिलती है...
पर मैं,
मुर्दा लाशों में महज खंजर घोपा करती हूं...
रोंदती हूं,
मर चुके अस्तित्व को,
और बस यूं ही कभी-कभी खुद को...
शुक्रवार, 30 मार्च 2012
मां, तू बहुत याद आती है...
मां, तू बहुत याद आती है...
ठीक सुबह की नींद सी मीठी तेरी याद,
अक्सर रात को नींद न आने वाला दर्द बन जाती है...
मां, तू बहुत याद आती है,
पलकों के झपकने के नित्यकर्म में,
जैसे कभी आंखों में कुछ गिरने पर,
वो फड़फड़ा जाती हैं,
मां, तू बहुत याद आती है...
खाली प्रेम पत्र सा है तेरा नेही हृदय,
न जताने पर अपार संभावनाओं से भरा,
लेकिन जब जताती है,
तो पन्नों की कमी पड़ जाती है...
मां, तू बहुत याद आती है...
अनिता शर्मा
बुधवार, 28 मार्च 2012
मंगलवार, 23 अगस्त 2011
ओह मेरे सूनेपने...
गुरुवार, 21 जुलाई 2011
क्योंकि मैं आधुनिक हूँ...

मु्झे देखिए,
परखिए और पंसद आने पर
चुन लीजिए,
आप लगा सकते है मेरी बोली,
अरे घबराएं नहीं,
यदि आप पुरुष हैं तो कतई नहीं,
मेरी बोली आपकी जेब पर नहीं पडेंगी भारी,
मैं तो बस आपसे चाहती हूं कुछ झूठे वादे,
कुछ दगा और कुछ कटु शब्दों के पक्के धागे,
कहिए कि आप मुझे प्यार करते हैं,
गर आप चाहते हैं मेरे हाथों को चूमना,
कहें एक ठहाके के साथ कि आप मेरे बिना जी नहीं सकते
और छू लीजिए मेरी कमर को,
और इच्छाएं कुछ ज्यादा ही हैं,
तो करें एक और झूठा वादा,
शादी का,
फिर देखिए कैसे मैं बिझ जाऊंगी आप के नीचे,
घबराएं नहीं मेरी बोली में केवल बंधन नहीं है,
आप सहजता से पा सकते हैं मुक्ति भी,
क्योंकि मैं हूं आधुनिक नारी,
बस कह दें कि नहीं हो सकती शादी,
जरा से उल्हाने दें मेरी पढ़ाई और आधुनिकता के,
बस मैं तैयार हो जाऊंगी किसी और के लिए...
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जब कभी तुम जिंदगी से थक जाओ...
जब कभी तुम जिंदगी से थक जाओ, तो मेरे पास आना... बैठना घड़ी भर को संग, वो तमाम किस्से मुझे फिर से सुनाना. और पूछना मुझसे कि हुआ कुछ ऐस...


