शुक्रवार, 20 जुलाई 2018

कहो न

तुम किसी को कितना चाह सकते हो, 
क्या दिन रात उसी में रह सकते हो...

क्या सौंप सकते हो उसे अपने मन का मनका, 
जिससे कोई वास्ता न हो तन का...
क्या जी सकते हो उसके बेतुके, बेमतलब जंजालों में, 
क्या खो सकते हो उसके उलझे-सुलझे बालों में...

क्या रह सकते हो उसके कच्चे मन के अंदर, 
क्या तैर सकते हो भावनाओं में जैसे अनंत समंदर...

क्या उड़ सकते हो बिन पंख उसकी कल्पनाओं के गगन में, 
कहो न, क्या कुछ यूं बस सकते हो तुम किसी के मन में...

तूफां

गुरुवार, 19 जुलाई 2018

तूफां

जि‍से शहर भर में तलाशती रही रूह,
वो आवारगी कहीं रगों में दौड़ती सी थी...

उसे कहां खबर थी, है दीवानगी हवाओं में,
जो बेतकल्लुफ हो लबों से नि‍गाहें प्यासी जा लगी थीं.

कहां था अंदाजा क‍ि ये जुनूं जला देगा आंचल सुर्ख शाम का,
क‍ि ये प्यास ले डूबेगी समंदर को भी...

इस पर भी कुछ यूं करीब से गुजर गया वो कम्बख्त,
जैसे गुजरा हो कोई तूफां चुपचाप सा तबाही कर बस अभी-अभी...

बेतकल्लुफी...

दिन के अंधेरे और रात के उजाले में,
जब कभी तुम यूं ही लौट आओ अपने आने-जाने में,
मुझे पुकार लेना, रोक लेना जरा इशारे से.
पूछना मुझसे तुम, क्या कहते हैं जमाने वाले,
हमारे और तुम्हारे बारे में.
हम बेतकल्लुफी से तुम्हें हर दर्द दिखाएंगे,
तुम जरा रो देना हम पर, हमारे दर्द पर,
फ‍िर देखना कैसे हम पर खि‍लखिलाकर ये जमाने वाले बेतहाशा मुस्कुराएंगे...

बुधवार, 11 जुलाई 2018

इंतजार

वक्त-बेवक्त, हर वक्त, इंतजार रहता है,
उंगल‍ियों के पोरवों पर, हवा सा यार रहता है,
वो रातें महसूस होती हैं लबों के सिरों पर,
सिलवटों का तो सिलसिला ही बेहिसाब रहता है,
लकीरों सा बिछा है हाथों में कहीं, पढ़ने को मन बेकरार रहता है,
वो चला गया कहकर कि अभी आता हूं,
पर फिर भी वक्त-बेवक्त, हर वक्त, इंतजार रहता है...

शनिवार, 12 सितंबर 2015

लिख दूं कि छोड़ दूं...

लिख दूं तुम्हें कि छोड़ दूं,
मेरे शब्दों,मेरे भावों
तुम्हें बांधू
या...
यूं ही हिला के छोड़ दूं

--

तुम्हें उड़ने दूँ स्वछंद कोरे पन्ने पर
या..
लपेट कर इक-दूजे में
रचना कोई उकेर दूं

--

निशब्द भावों तुम्हें,
भावहीन शब्दों तुम्हें,
क्योँ न आज,
भावार्थ दूं, शब्दार्थ दूं...

                              -- अनिता

शनिवार, 26 जनवरी 2013

ईश्‍वर का ईश्‍वर


ईश्‍वर का ईश्‍वर... 

कल यकायक जब मन घबरा उठा,
तो मैं सीधें पहुंची मंदिर की दहलीज पर,
नमन कर कहा ईश्‍वर से...
--
मेरे सृजनकर्ता,
परमपिता, पालनहार,
सुन लो मेरी गुहार,
संकट काटो मेरा,
मुझे जन्‍म दिया है तो,
हर दुख हर लो मेरा...

मैं तुम्‍हारी कृति हूं,
खो चुकी अपनी धृति हूं...
यह कह, श्रृद्धा से जब
नम आंखों को जब किया बंद,
यकायक कहीं से सुना एक स्‍वर मंद...

दबा-दबा सा स्‍वर कह रहा था,
तुम... तुम, तुम ही तो हो मेरी सृजनकर्ता,
भला मैं कैसे हुआ तुम्‍हारा दुखहर्ता,
मैंने तुम्‍हारा नहीं,
तुमने मेरा सृजन किया है,

तुम... हां मानव, तुम ही तो हो,
मुझे उत्‍पन्‍न करने वाले,
गढ़ कर पूजने वाले...
और मेरे अस्‍तीत्‍व को बेवजह परमपिता,
मां कह खुद पर मंढने वाले,

सुनो, मुझ पर यूं ही अपनी कृपा बनाए रखना,
मेरा अस्तित्‍व तुमसे है,
यह बात कभी न विसरना,
मेरी कृपा पर तुम नहीं,
तुम्‍हारी कृपा पर मैं जीवित हूं...

देते रहना मुझे यूं ही नियमित,
तुम्‍हारे डर और भावनाओं का आहार,
ताकि मैं कर सकूं जीवित विहार,
...
अंत में,
हे मानव,
मेरा नमन करो स्‍वीकार,
क्‍योंकि तुम ही तो हो,
हां, तुम ही तो हो मेरे पालन हार...

अनिता शर्मा 

सोमवार, 2 अप्रैल 2012

हत्‍या...

मुझे सजा होनी चाहिए,
वह भी फांसी की,
क्‍यों,
क्‍योंकि मैं हत्या की दोषी हूं...
वह भी एक या दो नहीं...
मैं रोज एक हत्‍या करती हूं...
कभी अपने आत्‍मसम्‍मान को,
तो कभी अपने अस्तित्‍व को,
मैं नित नए तरीको से कत्‍ल करती हूं...
--
ओह, मैं भी कितनी मुर्ख हूं...
भला मुझे सजा क्‍यों मिले,
सजा तो जीवित को निर्जीव करने पर मिलती है...
पर मैं,
मुर्दा लाशों में महज खंजर घोपा करती हूं...
रोंदती हूं,
मर चुके अस्तित्‍व को,
और बस यूं ही कभी-कभी खुद को...

जब कभी तुम जिंदगी से थक जाओ...

जब कभी तुम जिंदगी से थक जाओ, तो मेरे पास आना... बैठना घड़ी भर को संग, वो तमाम कि‍स्से मुझे फि‍र से सुनाना. और पूछना मुझसे क‍ि हुआ कुछ ऐस...